क्या नाबालिग के साथ contract किया जा सकता है? क्या नाबालिग के साथ किया गया contract वैध है जानिए Indian contract act के बारे में hindi में।

क्या नाबालिग के साथ Contract कर सकते है?

नाबालिग की संविदा ( Minor’s Contract ) धारा 11 के अनुसार, नाबालिग संविदा करने के लिए सक्षम नहीं है लेकिन भारतीय संविदा अधिनियम में यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि नाबालिग की संविदा की प्रकृति कैसी होगी। अर्थात् यह स्पष्ट नहीं है कि ऐसी संविदा शून्य होगी अथवा सिर्फ शून्य करणीय होगी।

1903 तक भारत के हाईकोर्टों में इस विषय में बड़ा मतभेद था लेकिन 1903 में प्रीवी काउन्सिल ने अंतिम रूप से इस मतभेद को खत्म कर दिया।

मोहरी बीबी बनाम धर्मोदास घोष ( आई.एल.आर. ( 1903 ) 30 कलकत्ता 539 ( P.C. ) ) के बाद में प्रीवी काउंसिल ने यह फैसला दिया कि संविदा अधिनियम की धाराओं 10 , 11 , 183 एवं 184 तथा पुरानी धाराओं 246 एवं 247 ( साझेदारी अधिनियम का नया section 30 ) से विदित है कि नाबालिग की संविदा केवल शून्य करणीय न होकर पूर्णरूप से शून्य होगी । इन सभी धाराओं का संयुक्त प्रभाव नाबालिग की संविदाओं को शून्य कर देता है , इसलिए नाबालिग की संविदा शुरू से पूरी तरह से शून्य है।

प्रीवी काउंसिल के अनुसार इस विषय में यह मत हिन्दू धारणा के भी मुताबिक है। भारत में वयस्कता की अवधि अठारह वर्ष है लेकिन जब किसी नाबालिग का या उसकी सम्पत्ति का अभिभावक नियुक्त कर दिया जाए तो वयस्कता की अवधि भारत में 21 वर्ष हो जाती है।

नाबालिग वह इंसान है जिसने उस विधि की व्यवस्थाओं के अनुसार जो उस पर लागू होता है वयस्कता न हासिल कर ली हो नाबालिग के साथ की गई सावेदा पूर्णतया शून्य होती है।

इसके निम्नलिखित दृष्टांत हैं-

( a )   प्रतिवादी अवयस्क M ने बिलियर्ड के सुप्रसिद्ध खिलाड़ी वादी P से करार किया कि वह उसके साथ विश्व के दौरे पर खेलने जाएगा। P ने बिलियर्ड के मैचों के लिए समय एवं धन व्यय किया लेकिन M से संविदा को विखण्डित कर दिया P ने संविदा के भंग के परिणामस्वरूप नुकसानी प्राप्त करने के लिए वाद किया P अपने इस केस में सफल नहीं होगा क्योंकि जैसा कि प्रीवी काउंसिल ने मोहरी बीबी बनाम धर्मोदास घोष के वाद में फैसला दिया कि नाबालिग की संविदा प्रारम्भ से ही शून्य होती है।
( b )  किसी फिल्म प्रोड्यूसर ने किसी चौदह वर्षीय लड़की रिहानी से करार किया जिसके अन्तर्गत रिहानी ने ' रंगीली ' फिल्म में एक्टिंग ( अभिनय ) करने के लिए अपनी स्वीकृति दे दी करार फिल्म प्रोड्यूसर से हुआ था और रंगीली की तरफ से रिहानी के पिता F ने हस्ताक्षर किए थे । फिल्म प्रोड्यूसर द्वारा करार का उल्लंघन करने पर रिहानी के अन्य दूसरे सम्बन्धी अपने पिता के द्वारा फिल्म प्रोडयूसर के खिलाफ वाद संस्थित किया । इस केस में वाद रिहानी नाबालिग से संविदा भंग के लिए किया था इसलिए संविदा उसके हित में थी । अगर न्यायालय इस बात से संतुष्ट हो जाय कि संविदा नाबालिग के हित में है जैसा कि इस केस में है, न्यायालय इसे वैध ( Valid ) घोषित कर सकते हैं एवं फिल्म प्रोड्यूसर को प्रतिकर देने को बाध्य कर सकते हैं ।
( c )   एक नाबालिग A अपने पक्ष में निष्पादित बंधक के बल पर ₹ 10,000 उधार देता है , क्या ऋणग्राही रुपए के प्रति संदाय हेतु उत्तरदायी है । नाबालिग की संविदा शून्य होती है । इस शून्य संविदा को लागू नहीं किया जा सकता है । इसलिए कोई बंधक विलेख को रद्द कर देगा । विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम 1936 की धारा 33 ( 1 ) के अनुसार किसी विलेख के रद्द किए जाने पर कोर्ट उस पक्षकार जिसे अनुतोष प्रदान किया गया है को आदेश दे सकता है कि उसने जो लाभ हासिल किया है जहाँ तक सम्भव हो उसे पक्ष पक्षकार को वापस करे जिससे प्राप्त किया है तथा न्याय के अनुसार उसे प्रतिकर दे ।
इस लिए कोर्ट को इस धारा में विवेकाधिकार है कि ऋणग्राही को कहे कि वह नाबालिग को  10,000 वापस करे। अतः इस केस में ऋणग्राही ही संविदा को शून्य घोषित कराना चाहेगा। इसलिए कोर्ट उसे 10,000 एवं उपयुक्त प्रतिकर को देने को बाध्य कर सकता है। इसके अलावा भारतीय न्यायालय का यह अभ्यास रहा है कि अगर संविदानाबालिग के हित में होती है तो उसे वैध मानते हुए दूसरे पक्षकार को प्रतिकर देने को बाध्य करते हैं । धारा 11 के सक्षम होने के लिये स्वस्थचित ( sound mind ) का होना आवश्यक है।

जहाँ किसी व्यक्ति ने संविदा का विलेख ( deed ) उस समय किया जब शराब आदि के कारण स्वस्थ चित्त का नहीं था । बहुमूल्य भूमि बहुत कम कीमत में बेची जाती है , तो ऐसी संविदा निरस्त किए जाने योग्य होगी क्योंकि संविदा धारा 11 के अन्तर्गत शून्य होगी । यह निर्णय उच्चतम न्यायालय ने चाको बनाम महादेवन ( Chacko v Mahadevan ) , के वाद में दिया।

इस वाद में शराब के प्रभाव में चाको ने 54,000 की भूमि को केवल 1,000 में बेचने का विलेख निष्पादित किया। उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि विलेख निष्पादित करते समय चाको स्वस्थ चित्त का नहीं था तथा उस समय उसके साथ कुछ कपट भी किया गया था । 

अंग्रेजी विधि में अवयस्क की संविदा- अंग्रेजी विधि में अवयस्क द्वारा की गई सभी संविदाएँ शून्य नहीं होती हैं। कुछ शून्य होती हैं तथा कुछ शून्यकरणीय होती हैं। यदि अवयस्क का किसी स्थायी सम्पत्ति में कुछ हित होता है तथा उसके अन्तर्गत कुछ दायित्व भी होते हैं या वह कोई संविदा करता है जिसके चिरगामी हित तथा दायित्व होते हैं और वह ऐसी संविदा के अन्तर्गत लाभ उठाता है तो वह ऐसी संविदा से तब तक बाध्य होगा जब तक कि वह ऐसी संविदा के अन्तर्गत अपने दायित्व को अस्वीकार नहीं करता या वयस्क होने के युक्तियुक्त समय के अन्दर ऐसी घोषणा नहीं करता। अतः इंग्लैण्ड में कुछ ऐसी सुविधाएँ होती हैं जिनका पालन करने के लिये अवयस्क बाध्य होता है।

वह तब तक वैध रहती है जब तक कि अवयस्क उन्हें समाप्त नहीं कर परन्तु अवयस्क द्वारा की गई निम्नलिखित contract पूर्णतः शून्य होती हैं-

  • धन की पुनः देनगी के लिये या उधार लिये धन के लिये उस अवयस्क द्वारा contract।
  • प्रदाय की गई वस्तुयें या की जाने वाली वस्तुओं के लिये contract।
  • अवयस्क द्वारा लेखा-सम्बन्धी संविदायें। अंग्रेजी विधि तथा भारतीय विधि में अन्तर जैसा कि पहले स्पष्ट किया जा चुका है कि , इंग्लैण्ड में अवयस्क द्वारा की गई सभी संविदायें पूर्णरूप से शून्य नहीं होती हैं , परन्तु भारत में 1903 में मोहरी बीबी बनाम् धर्मोदास घोष के बाद में प्रिवी काउन्सिल ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अवयस्क द्वारा की गयी सभी contract पूर्णरूप से तथा प्रारम्भ से ही शून्य होती हैं।

अंतिम शब्द-

आज मेंने आपको यह बताया की नाबालिग के साथ contract किया जा सकता है या नहीं मुझे उम्मीद है की आपको मेरे द्वारा दी गयी जानकारी पसंद आयी होगी आपके कोई प्रश्न हो तो आप कमेंट के माध्यम से पूछ सकते है धन्यबाद।

IPC SECTION 384 IN HINDI

IPC SECTION 323 IN HINDI

IPC SECTION 506 IN HINDI

B.COM, M.COM, B.ED, LLB (Gold Medalist Session 2019-20) वर्तमान में वह उत्तर प्रदेश के हाथरस जिले में एक विधिक सलाहकार के तौर पर कार्य कर रहे हैं।

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